Friday, September 16, 2011

My First poem.. thanks to all of my friends who knowingly or unknowingly inspired me for it...

सोच... एक विचार 

मै सोचता हूँ कि इतना सोच कर मैंने क्या पाया,
सोच- सोच कर भी खुद को न ढूंड पाया 

कभी  खुद को रुलाया और कभी बेवजह हसाया
सोचता हु कि मैंने क्या खोया,  क्या  पाया

कभी असफलता के डर ने सताया 
तो कभी अपनों के प्यार ने रुलाया
कभी लक्ष्य की ऊचाइयो  ने डराया
तो कभी सब छोड़ दूर भाग जाने को मन चाहा


दुनिया के रंग रूप को देखा,
तो खुदको कभी सही तो कभी गलत पाया 
Something lost in the path...
इस सही गलत क चक्कर  में,
क्या था मै यही न जान पाया...

उसको पाया और फिर बिन उसके  न रह पाया...
कुछ कहना चाहा, पर कुछ कह कर भी कुछ न कह पाया
जब उससे दूर जाना चाहा, तो दूर न जा पाया 
जिन्दगी ने मुझे एक एसे मुकाम पे लाया 
कि जो सोचा, वो कर न पाया 
और जो किया  वो कभी सोच ना पाया...